आवासीय संस्कृत विद्यालय पाठ्यचर्या की रूपरेखा

आवासीय संस्कृत विद्यालय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 

‘‘हमारी संस्कृत शाला ऐसी हो’’ 

दृष्टिकोण, लक्ष्य एवं उद्देष्य तथा ध्येयवाक्य 

(क) दृष्टिकोण - 
आवासीय संस्कृत विद्यालयों में षिक्षा व्यवस्था कोई विषिष्ट प्रकार की षिक्षा न होकर पूरे देष के लिए चल रही एक राष्ट्रीय षिक्षा क्रम के ढ़ाचे पर ही आधारित होना चाहिए। जिसमें संस्कृत भाषा, साहित्य एवं अन्य संबंधित आनुसंगिक विषय एक सामान्य केन्द्र में होंगे। अन्य हिस्सो को वर्तमान भारतीय परिवेष के अनुसार ढ़ाला जा सकेगा। इसके पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय मूल्य एवं भारतीय सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संचेतना मुख्य रूप से शामिल होंगे। जिसे हर विद्यार्थी की सोच और जिन्दगी का हिस्सा बनाने का प्रयत्न किया जावेगा। इन राष्ट्रीय मूल्यों में ये बाते सम्मिलित है। 
(1) हमारी गौरवषाली साहित्यिक, सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर 
(2) वैभवषाली परम्पराएँ, 
(3) देष भक्ति 
(4) भारतीय विज्ञान की उज्जवल परम्परायें 
(5) लोक संस्कृति 
(6) प्रतिभाषाली स्थापत्य कला एवं शैली 
(7) लोकतंत्र के प्रति आस्था 
(8) सामाजिक समता इत्यादि । 

यह सुनिष्चित किया जायेगा कि सभी शैक्षिक कार्यक्रम पंथ निरपेक्षता के मूल्यों के अनुरूप हो। भारत ने विभिन्न देषों में शान्ति और आपसी भाई चारे के लिये सदा प्रयास किया है और ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ के आदर्षो को संजोया है। इस परम्परा के अनुसार षिक्षा व्यवस्था का प्रयास यह होगा कि नई पीढ़ी में विष्वव्यापी दृष्टिकोण सुदृढ़ हो और अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व की भावना बढ़े। समानता के उद्देष्य को साकार बनाने के लिये सभी को षिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नही होगा बल्कि ऐसी व्यवस्था होना भी आवष्यक है जिनमें सभी को षिक्षा में सफलता प्राप्त करने के समान अवसर मिले। षिक्षा के इस पहलू की उपेक्षा नही की जा सकती । वास्तव में दृष्टि कोण यह है कि सामाजिक माहौल और जन्म संयोग से उत्पन्न पूर्वाग्रह और कुंठाये दूर हो । समानता की दिषा में षिक्षा की महत्व पूर्ण भूमिका यह समझी जाती है कि वह सभी षिक्षार्थियों को अपने अधिकारों की दिषा से सक्षम बनायें ताकि वे समाज व राजनीति के माध्यम से देष को आगे बढ़ाने में अपना योगदान कर सके। इसके लिये यह षिक्षा ऐसी होना चाहिए कि वे समाज के सभी प्रकार के विद्यार्थियों विषेषतः बालिकाओं में यह सामथ्र्य दे सके और उनकी क्षमताओं का इस प्रकार विकास कर सके कि वे आगे चलकर स्वायत्त एवं समान नागरिक बन सके।

(ख) मार्गदर्षी सिद्धान्त - 

आवासीय संस्कृत विद्यालयों में संस्कृत षिक्षा के अग्रसर करने के प्रयोजन हेतु हमे व्यवस्थागत मुद्दों पर ध्यान देने तथा उन्हें नियोजित करने की आवष्यकता है जिससे हम उन अनेक अच्छे विचारों को कार्यान्वित कर सके जिसके बारे में हम दृष्टिकोण में चर्चा कर चुके है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है:- 
1. संस्कृत भाषा और साहित्य के ज्ञान को बाहर के व्यावहारिक जीवन से जोड़ना। 
2. संस्कृत षिक्षा रटन्त प्रणाली से मुक्त हो सुनिष्चित करना। 
3. संस्कृत पाठ्यचर्चा का इस तरह सवंर्धन कि वह विद्यार्थियों की चंहुँमुखी विकास के अवसर उपलब्ध कराये बजाय इसके कि वह पाठ्यपुस्तक केन्द्रित बन कर रह जाये। परीक्षा को अपेक्षाकृत अधिक लचीला बनाना और कक्षा की गतिविधि से जोड़ना। 
4. एक ऐसी अधिभावी पहचान का विकास जिसमें हमारी वैभवषाली संस्कृतिक परम्पराओं के साथ प्रजातांत्रिक राज्य व्यवस्था के अन्तर्गत राष्ट्रीय चिन्ताएं समाहित हों। संस्कृत षिक्षा के लक्ष्यों में ऐसे दिषा निर्देष समाहित किये जाने होगे जो व्यापक शैक्षणिक पाठ्यक्रम के तय किये उद्देष्यों एवं स्वीकृत सिद्धान्तों से संगति बैठाने में मदद करते है। 

(ग) संस्कृत षिक्षा के लक्ष्य/उद्देष्य - 

गौरवषाली भारतीय संस्कृति और परम्पराओं की स्थापना के साथ समाज की मौजूदा महत्वकांक्षाओं व जरूरतों के साथ शास्वत मूल्यों तथा समाज के तात्कालिक सरोकारों सहित वृहद मानवीय आदर्षों की स्थापना संस्कृत षिक्षा के प्रमुख लक्ष्यों में एक है। किसी भी खास समय और स्थान के सन्दर्भ में इन्हें व्यापक और शाष्वत मानवीय आकांक्षाओं और मूल्यों की समकालीन एवं प्रासंगिक अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। संस्कृत षिक्षा के लक्ष्य संस्कृत विद्यालयों द्वारा चलायी जा रही विभिन्न गतिविधियों को एक रचनात्मक ढ़ाचे में ढ़ालकर उन्हें शैक्षिक होने का विषिष्ट चरित्र प्रदान करते है। सामान्य रूप से कहें तो संस्कृत षिक्षा के उद्देष्य निम्नानुसार है:-

 उद्देष्य 

1. संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन को प्रोत्साहन एवं प्रोन्नत करना। 
2. संस्कृत की षिक्षा के परम्परागत अध्ययन को और भी उद्दे ष्य पूर्ण बनाने के लिये बालिका षिक्षा से जोड़ना तथा प्राचीन एवं आधुनिक पद्धतियों के बीच समन्वय स्थापित करना। 
3. नवाचार सहित संस्कृत षिक्षा को ’’प्रायोज्य प्रणाली विज्ञान’’ के आधार पर संचालित करना 
4. संस्कृत साहित्य में निहित ज्ञान को अवगत कराना।
5. संस्कृत साहित्य में सन्निहित भारतीय संस्कृति का ज्ञान कराना। 
6. संस्कृत साहित्य में निहित मानवीय मूल्यों से परिचित कराना। 
7. संस्कृत साहित्य में अन्तर्निहित विज्ञान के ज्ञान से भारत के अतीत के गौरव का ज्ञान कराना। 
8. विद्यार्थियों को रोजगार परक उत्कृष्ट संस्कृत षिक्षा उपलब्ध कराना। 

(घ) ध्येयवाक्य - ‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’
(च) आवासीय विद्यालयों के लिए पाठ्यक्रम - महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान की विद्या परिषद में अनुमोदित पाठ्यक्रम आवासीय संस्कृत विद्यालयों के लिये लागू रहेगा। 

बिन्दु क्रमांक - 02 आवासीय विद्यालय की समय सारणी 

आवासीय संस्कृत विद्यालय में समय-सारणी की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। समय-सारणी का निर्माण इस प्रकार किया जाना चाहिए ताकि विद्यार्थियों को शैक्षिक गतिविधियों के साथ सहषैक्षिक क्षेत्र एवं सह पाठ्यक्रम कार्य करने का पर्याप्त अवसर प्राप्त हो सके। इन तीनों ही प्रकार की गतिविधियों से विद्यार्थी को अपनी पूर्ण दक्षता के साथ सिखने के अवसर प्राप्त हो सके। संस्कृत विद्धनों के समूह द्वारा आवासीय संस्कृत विद्यालय के लिये निम्नानुसार समय-सारणी मान्य की गयी है।

प्रातः 4 बजे (अप्रैल से सितम्बर) - जागरण 
प्रातः 5 बजे (अक्टूबर से मार्च ) - जागरण 
प्रातः 5ः15-6ः15 - दन्तधावन स्नानादि नित्यक्रियाएॅ 
प्रातः 6ः15-7ः30 - प्रार्थना, वेदपाठ, उपासना 
प्रातः 7ः30-8 बजे - योग, क्रियायें- (भारत सरकार आयुष मंत्रालय के द्वारा बेबसाइट ीजजचेरूध्ध् लवहंण्ंलनेीण्हवअण्पद पर जारी सामान्य योग अभ्यास क्रम के अनुसार)
प्रातः 8ः00-8ः30 - स्वल्पाहार 
प्रातः 8ः30-10ः00 - आवास स्थल में गृह कार्य, स्वाध्याय 
प्रातः 10ः00-10ः30 - राष्ट्रगान, प्रमुख समाचार वाचन, सुविचार, जन्मदिन बधाई, महापुरूषों की जयंन्ती। पुण्यतिथि की सूचना, विषेष दिवस की सूचना, प्राचार्य की सूचना प्राचार्य/षिक्षक द्वारा प्रतिज्ञा उपस्थिति। 
प्रातः 10ः30-11ः10 - प्रथम कालखण्ड 
प्रातः 1110-11ः50 - द्वितीय कालखण्ड 
प्रातः 11ः50-12ः30 - तृतीय कालखण्ड 
दोपहर 12ः30-1ः30 तक - भोजनावकाष (आवास स्थल पर भोजन मंत्र/प्रार्थना सहित भोजन) 
दोपहर 1ः30-2ः10 - चतुर्थ कालखण्ड
दोपहर 2ः10-2ः50 - पंचम कालखण्ड
दोपहर 2ः50-3ः30 - षष्ठम कालखण्ड
दोपहर 3ः30-4ः10 - सप्तम् कालखण्ड
दोपहर 4ः10-4ः30 - सभास्थ्ल पर एकत्रीकरण म.प्र.गान
सायं 4ः30 से 5ः00 बजे तक - विश्राम (हस्तमुख प्रक्षालनं) स्वल्पाहार चाय आदि
सायं 5ः00-6ः30 - खेल एवं युवा कल्याण मंत्रालय की बेवसाइट पर जारी फिजीकल फिटनेस कार्यक्रम की गतिविधियाँ, (इनडोर/आउटडोर) दल/कक्षा विभाजन द्वारा क्रीड़ा षिक्षक के मार्गदर्षन में।
सायं 6ः30-8ः00 - स्वाध्याय, सायं संध्या एवं पुस्ताकालय/ प्रयोगषाला/आध्यात्मिक/पौराणिक शास्त्रों का अध्यापन/मूर्तिकला/चित्रकला/संस्कृत सम्भाषण /संगणक प्रषिक्षण (सदन विभाजन द्वारा संचालन) 
रात्रि 8ः00-9ः00 - भोजन रात्रि, भोजन प्रार्थना मंत्र सहित
रात्रि 9ः00-10ः00 - सांस्कृतिक कार्यक्रम, आषुभाषण, ष्लोक गायन प्रष्नमंच समान्यज्ञान, गीत गायन, संस्कृत संभाषण (सदन/दल एवं गतिविधियाॅ विभाजन द्वारा)
रात्रि 10ः00 बजे - शयन


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