कक्षा कक्ष व्यवस्था

  क्रीडा मैदान होना चाहिए, भारतीय खेल कबड्डी, खो-खो, कुष्ती, मलखंभ, भारोत्तोलन, धनुर्विद्या, तैैराकी, निषानेबाजी, दण्ड-मुण्ड, नियुद्ध कराटे, तलवार बाजी आदि विधाए सिखाए।

 घुडसवारी, क्रिकेट, बैडमिंटन, बाॅलीवाल, बास्केटबाॅल, टेनिस आदि खेल की भी व्यवस्था हो।

 सभी प्रकार के इनडोर-आऊटडोर खेलों की व्यवस्था हो। क्रीडा एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का जिला/राज्य/राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्षन के लिए छात्रों को तैयार किया जाए और भेजा जाए।

 व्यायामषाला एवं आधुनिक जिम भी बनाई जाए।

 बालिकाओं एवं रूचि अनुसार बलकों के सिलाई, कढाई, बुनाई, रंगोली, मेंहदी, श्रृंगार आदि का प्रषिक्षण दिया जाना चाहिए।

 संगीत, नृत्य, वाद्य, गायन भारतीय/शास्त्रीय आधुनिक का प्रषिक्षण होना चाहिए।

 नाट्य, अभिनय, संवाद, सम्भाषण कला का षिक्षण होना चाहिए।

 प्रायोगिक षिक्षण में गौषाला, कृषि, यज्ञषाला निर्माण प्रबन्धन आदि सिखाया जाना चाहिए।

 वन्य क्षेत्र हो जिसमें औषधीय वृक्ष लगाए जाऐ एवं उनके उपयोग का विवरण लिखा होना चाहिए। ग्रह एवं नक्षत्र वाटिका होना चाहिए।

 जलाषय (तरणताल) का निर्माण होना चाहिए।

 परिसर की परिधि के किनारे फलदार, छायादार वृक्ष लगाए जाए।

 परिसर के प्रवेष द्वार से लेकर प्रत्येक भवन तक सूक्तियों को लिखकर पट्ट और पट्टिियाॅ संस्कृत एवं अंग्रेजी भाषाओं में लगाए जाए।

 परिसर को चारों तरफ से परिधि (बाउण्ड्रीवाल) से सुरक्षित किया जाए।

 परिसर में स्थान-स्थानवार ब्ब्ज्ट कैमरे, संकेतक पट्टिका, स्पीड ब्रेकर बनाया जाए।

 अध्यापकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों के लिए वाहन रखने का स्थान बनाई जाए।

 महिला/पुरूष सुरक्षा गार्ड की व्यवस्था की जाए।

 मुख्य द्वार पर प्रवेष करने वाले वाहनों की आवागमन पंजी/आगन्तुक पंजी की व्यवस्था हो।

बिन्दु क्रमांक - 10 कक्षा कक्ष व्यवस्था

 प्रत्येक भवन का नामकरण ऋषियों अथवा महान संस्कृतज्ञों के नाम पर रखा जाए।

 कक्षाओं के बाहर विभागीय पट्टिका लगाई जाए।

 सामान्यतः कक्षा कक्ष आधुनिक पद्धति का बहुउद्देष्यीय बनाया जाए।

 वेद की कक्षाओं के लिए ’’पीठ’’ व्यवस्था बनाई जाए।

 उपासना कक्ष/ध्यान कक्ष बनाया जाए जिसमें माॅ सरस्वती की प्रतिमा स्थापित की जाए। यह उपासना कक्ष प्रातः कालीन संध्या/ध्यान योग के लिए उपयोग किया जाए।

 एक बहुउद्देष्यीय सभागार बनाया जाए जिसमें इनडोर गेम्स की सुविधा/जिम भी बनाया जा सके।

बिन्दु क्र. 11 संवाद का माध्यम

परिसर में संवाद की भाषा संस्कृत रहेगी। सप्ताह में एक दिन अंग्रेजी में संवाद किया जाना चाहिए।

नोट - संस्कृत एवं अंग्रेजी सम्भाषण कौषल के विकास के लिए साप्ताहिक सभा/ परिषद् का आयोजन हो जिसमें शैक्षणिक/सांस्कृतिक गतिविधियों का संचालन हो।

विषेष - किसी भी एक प्रान्तीय भाषा का ज्ञान कराया जाए। 

 भाषा षिक्षण के साथ-साथ लिपि का ज्ञान भी कराया जाना चाहिए। यथा- ब्राह्मी, शारदा, ग्रन्थ, नागरी, तमिल, द्रविड)

बिन्दु क्रमांक - 12 केरियर काउंसलिंग

केरियर काउंसलिंग - कैरियर निर्माण हेतु विद्यार्थियों को आवष्यकता आधारित कैरियर काउंसलिंग प्रदान की जाए। विभिन्न व्यवसायों में कार्यरत विषेषज्ञों से भेंट करवाई जा सकती है। इससे विद्यार्थी विभिन्न व्यवसायों से एवं उनमें प्रवेष की प्रक्रिया से परिचित हो सकेगे। उदाहरण के लिये डाॅक्टर, अधिकारी, वकील, इंस्पेक्टर, इंजीनियर, खिलाड़ी, नर्स, व्यवसायी, पत्रकार, समाजसेवी कार्यकर्ता इत्यादि को आमंत्रित किया जा सकता है।

बिन्दु क्रमांक - 13 रोजगारोन्मुखी ज्योतिष-वास्तु-पौरोहित्य

(क) पाठ्यक्रम का निर्माण -

 प्रायोजन - उपर्युक्त विषयो के अध्ययन को रोजगारोन्मुखी बनाना।

 वर्तमान स्थिति - मूल शास्त्रीय ग्रन्थों के पाठ्यक्रमों ससमावेष के कारण उपर्युक्त विषयों के व्यवहारिक ज्ञान का अभाव।

 दृष्टि - मूल ज्योतिष, और व्यवहारिक वास्तु, पाठ्यक्रम के निर्माण व संचालन के द्वारा छात्रों को रोजगारोन्मुखी (कौषलयुक्त) बनाना

 अनुशंसा:- (क)वर्तमान पाठ्यक्रम में 08वीं (तृतीय वर्ष) से आरम्भ कर 12वीं (उ.मा.द्वि. वर्ष) तक वैकल्पिक विषयों के रूप में व्यवहारिक ज्योतिष, वास्त, पौरोहित्य का समावेष के रूप में व्यवहारिक ज्योतिष, वास्तु, पौरोहित्य का समावेष

 वर्तमान पाठ्यक्रम उपर्युक्त विषयों पर निर्धारित पाठ्यक्रम अधोलिखित कक्षावार पाठ्यक्रम का उचित समायोजन।

 आवासीय संस्कृत विद्यालयों में निर्धारित पाठ्यक्रम के साथ उपर्युक्त में किसी एक का अभिरूचि के अनुसार अनिवार्य विषय के रूप में अध्ययन -

Reactions

Post a Comment

0 Comments